प्रदुषण बीमारियों की जड़, सिकुड़ रहे हैं बच्चों के फेफड़े

November 15, 2017 10:15 am

बाल दिवस पर Journal of Indian Pediatrics की एक रिपोर्ट सामने आई है, वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टर-प्रफेसर एस के छाबड़ा द्वारा की गई इस स्टडी के अनुसार दिल्ली के प्रदूषित माहौल में बढ़ रहे बच्चों के फेफड़ों का विकास अमेरिका जैसे विकसित देशों के बच्चों की तुलना में कम हो रहा है। इस स्टडी में सामने आया है कि जेनेटिक फैक्टर के अलावा फेफडों के विकास पर हवा की गुणवत्ता और बचपन में हुए इंफेक्शन का असर भी पड़ता है। इस स्टडी के अनुसार देश के व्यस्क व्यक्तियों के फेफड़ों का साइज भी अमेरिका की तुलना में छोटा होता है। छोटे फेफड़ों की वजह से एक्सरसाइज क्षमता कम होती है और बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।

दिल्ली में प्रदूषित हवा से होने वाली बीमारियों के कारण होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मंगलवार को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तत्वाधान में देश के मेडिकल और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स द्वारा जारी पहले ‘सिस्टमेटिक असेसमेंट’ में यह बात सामने आई। इसमें बताया गया कि देश और सभी राज्यों में लोगों के जीने के संभावित साल तो बढ़ रहे हैं, परन्तु प्रदूषण के कारण बढ़ रही बीमारियां राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा खतरा बन चुकी हैं।

स्वास्थ्य और प्रदूषण पर लैनसेट आयोग द्वारा पर्यावरण से जुड़े हेल्थ रिस्क दी गई पूरी रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व में हर वर्ष 90 लाख हवा,पानी और केमिकल के एक्सपोजर के कारण मर जाते हैं। इसमें वायु प्रदुषण सबसे ऊपर है, 60 लाख लोग सिर्फ वायु प्रदूषण के कारण मर जाते हैं। भारत में इसकी स्थिति काफी खराब है, यहां लगभग 19 लाख प्री मैच्योर मौतें सिर्फ आउटडोर और इनडोर पल्युशन की वजह से हो जाती हैं।

IMMR और IMHI के मेडिकल एक्सपर्ट के अनुसार पिछली तिमाही के दौरान देश में होने वाली मौतों और दिव्यांगता के कारणों में बदलाव आए हैं। डायरिया और अन्य बीमारियां से होने वाली मौतों का ग्राफ कम हुआ है तो दिल से जुड़ी बीमारियों का ग्राफ तेज़ी से बढ़ रहा है। यह बीमारियां मुख्य तौर पर हवा में प्रदूषण और स्मोकिंग के कारण फ़ैल रही हैं। एक्सपर्ट के अनुसार इन बीमारियों से जुड़े रिस्क फैक्टर के अध्ययन से पता चला है कि स्वस्थ्य रहने के साल कम होने की दूसरी सबसे बड़ी वजह बाह्य और आंतरिक प्रदुषण है।

1990 से 2016 तक जीने की प्रति व्यक्ति औसत आयु 64 से बढ़कर 73 तक हो गई है, परन्तु बीमारियों की वजह से क्वॉलिटी ऑफ लाइफ में कमी आई है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण से जुड़ी बीमारियां हर उम्र के लोगों में तेजी से बढ़ रही हैं। 1990 में क्रॉनिक रेस्पिरेट्री डिजीज से होने वाली मौतों और बीमारियों का स्थान 13वां था, परन्तु अब यह टॉप-3 में है। 40 से 69 साल के लोगों में 60 पर्सेंट लोग क्रॉनिक रेस्पिरेट्री बीमारियों, कार्डियो और कैंसर से प्रभावित है। इस आयु वर्ग की प्रदूषण में होने वाली मौतों में 41 पर्सेंट हिस्सेदारी है। यह तथ्य भी सामने आया कि दिल संबंधी बीमारी भी पांचवें नंबर से पहले नंबर पर पहुंच गई है। GDB (Global Burden of Disease) से पता चलता है कि भारत में होने वाली प्रीमैच्योर डेथ में 50 पर्सेंट मौतों का कारण दिल से जुड़ी बीमारियां हैं जो कि हवा में फैले प्रदूषण के कारण फ़ैल रही हैं।

 

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