अनुपम खेर के नाम खुला पत्र

March 8, 2016 4:57 pm

श्री अनुपम खेर जी,

टेलीग्राफ डिबेट में आपके भाषण का वीडियो देखने का मौका मिला। तमाम विरोधों के बावजूद इतने आत्‍मविश्‍वास के साथ वहां खड़े होकर भाषण देने के लिए बधाई।

anupam-kherआप मुझे राष्‍ट्रद्रोही घोषित करें, इससे पहले मैं बता दूं कि मैं भी उन्‍हीं 31 प्‍वाइंट स‍मथिंग प्रतिशत लोगों की श्रेणी में आती हूं जिसने वर्तमान सरकार को सत्‍ता सौंपी। मुझे इस बात का पछतावा भी नहीं है और इसका मुख्‍य कारण है कि देश में सत्‍ता परिवर्तन जरूरी था और यकीन मानिए, उस वक्‍त मैं भी इसी सोच में थी कि मोदीजी के अलावा देश की बागडोर संभालने की क्षमता फिलहाल इस देश में और किसी के पास नहीं। मुझे पछतावा न होने का कारण सुषमा स्‍वराज, सुरेश प्रभु और पियूष गोयल जैसे चुनिंदा मंत्री भी हैं जो तमाम विवादों से दूर अपने काम से काम रखे हुए हैं और जनता के लिए समर्पित हैं।

चलिए अब मुद्दे पर आते हैं। आपने भाषण गजब का दिया। वही मेलोड्रामा था, जो संसद में शिक्षामंत्री के भाषण में दिखा। हो भी क्‍यों न, एक ही बिरादरी (अभिनय) से जो आते हैं। आगे बढ़ते हैं, आपने भाषण की शुरुआत जस्टिस गांगुली पर प्रहार के साथ की। देश में शीर्ष न्‍यायिक पद पर रह चुके व्‍यक्ति की आलोचना कौन कर रहा था, अनुपम खेर, जो स्‍वयं को एक विस्‍थापित कश्‍मीरी पंडित बताता है। साहेब यह मेरे देश की साहिष्‍णुता (यह वही शब्द है जो आपके अनुसार देश का आम आदमी उच्‍चारित भी नहीं कर पाता, मैं भी आम आदमी, सॉरी औरत हूं) ही है कि आपकी हिम्‍मत हो गई, बुलंद आवाज में, जस्टिस गांगुली के लिए ‘डिस्‍ग्रेस’,’यू शुड भी अशेम्‍ड ऑफ’, ‘इट्स सैड’, जैसे शब्‍दों का इस्‍तेमाल एक सार्वजनिक सभा में करने की। और किसलिए, अपने विचार रखने के लिए, वे आपसे अधिक कानून जानते हैं, उन्‍हें पता है कि जिस राष्‍ट्रद्रोह के आरोपी कन्‍हैया को आप बिना सबूत के अब भी नारे लगाने का दोषी बता रहे थे, उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। आपकी बाकी टिप्‍पणियों को बरखा दत्‍त ने अपने भाषण में नकारा साबित कर ही दिया था। उसी भाषण में आगे आपने भाजपा के योगियों और साध्वियों को पार्टी से निकाले जाने की बात की, आपका गुस्‍सा दिख रहा था, कुछ अत्‍याधिक आक्रामक शब्‍दों का इस्‍तेमाल आप उनके लिए करना चाह रहे थे, लेकिन ‘ओम नम: शिवाय’ में आपने अपने क्रोध को छिपा लिया।

यह जस्टिस गांगुली की साहिष्‍णुता थी कि आपके साथ उन्‍होंने वैसा सलूक वहां नहीं किया जो आप अपनी पार्टी के साध्वियों और योगियों के खिलाफ करने के बारे में बोल भी नहीं पा रहे थे। वे चुपचाप बैठे रहे। इसे साहिष्‍णुता कहते हैं।

आपने यह भी कहा कि आप मोदीजी की तारीफ इसलिए नहीं कर रहे हैं क्‍योंकि आपकी पत्‍नी भाजपा सांसद हैं।यह तो हम भी जानते हैं, वह काम तो किरण जी जरूरत पड़ने पर खुद भी बखूबी कर सकती हैं, वह भी अभिनेता बिरादरी से हैं। पर हम एक बात और समझते हैं, जो आप कभी नहीं मानेंगे कि आप किरणजी को इंप्रेस करने के लिए नहीं बल्कि भाजपा के शीर्ष नेताओं को इंप्रेस करने के लिए भाजपा को डिफेंड करते हैं। यह गलत भी नहीं है, आखिर आपको भी तो अपना राजनीतिक कैरियर चमकाना है! पर साहेब कुछ तथ्‍यों के साथ तो जाते।

आपने कहा कि आपके पद्मश्री को लोग आपकी चमचागिरी का ईनाम मानते हैं। हम नहीं मानते साहब। ऐसा मानना उन सभी विजेताओं की तौहीन होगी जो वाकई अपनी मेहनत के दम पर इस सम्‍मान के हकदार हुए हैं। लेकिन आप पद्मश्री मिलने से पहले कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में किए गए अपने एक ट्वीट को डिलीट करना कैसे भूल गए जिसमें आपने ही इन पुरस्‍कारों को चमचागिरी का ईनाम बताया था। ऐसा हम भी करते थे, स्‍कूल में जब किसी कंपीटिशन में ईनाम नहीं मिलता था तो जजों को पक्षपाती बता देते और जब मिल जाता तो उन्‍हें डिफेंड करने लगते। लेकिन यह सब हम स्‍कूल में ही करते थे। आप बड़े हो गए हैं, शिक्षक हैं, कइयों के आदर्श भी, यह आपको शोभा नहीं देता। प्रधानमंत्री ने दो साल से छुट्टी नहीं ली, साहेब उन्‍हें छुट्टी लेने की जरूरत क्‍या है। विदेश दौरों पर जाते हैं, काम के साथ तफरीह भी कर लेते हैं (यह मत कहिएगा कि झूठ है, पीएम साहेब खुद सेल्‍फी शेयर करते हैं), हमारी तरह परिवार जैसी बंदिश भी नहीं कि जहां जाओ परिवार को साथ लेकर जाओ, न कोई यह कहने वाला कि जब परिवार के साथ हो तो काम मत करो, वे तो खुद ही कहते हैं कि सारा भारत उनका परिवार है। फिर अपने ही परिवार जनों (जिनमें से कुछ कश्‍मीर में भी रहते हैं) के साथ यदि वे दीवाली मनाते हैं, तो आप उनके बिहाल्‍फ पर देशवासियों पर अहसान क्‍यों जता रहे हो।

यह भी सही है कि पिछले 2 सालों में किसी ने भ्रष्‍टाचार का नाम नहीं सुना। वह तो किसी ने यूपीए प्रथम के कार्यकाल में भी नहीं सुना। परतें तो पहले कार्यकाल की समाप्ति के साथ खुलने लगीं। आप ही कहते हो ना कि दो ही साल हुए हैं, काम करने दो। हम भी यही कहते हैं, दो ही साल हुए हैं, सैटल हो जाएंगे, समझ लेंगे कि काम क्‍या है (यह इसलिए  कह रही हूं कि कुछ मंत्री अब तक अपना काम समझ ही नहीं पाए हैं।) तब पता चलेगा कि भ्रष्‍टाचार हुआ है या नहीं। ईश्‍वर से प्राथना है कि न ही हो।

निस्‍संदेह हमारे प्रधानमंत्री, उनकी टीम बहुत अच्‍छा काम कर रही है, सराहना मिलनी भी चाहिए। लेकिन एक आदर्श मतदाता होने के नाते मेरा यह भी फर्ज है (अधिकार भी) कि मैं अपनी सरकार की गलतियों पर उनकी आलोचना करूं, अपेक्षा करूं वे अपनी गलती मानें , उसे सुधारें। तभी तो यह एक आदर्श सरकार बन पाएगी। आपको इसमें समस्‍या क्‍या है। आपको क्‍यों लगता है कि देश की सरकार कुछ गलत नहीं कर सकती।

आपसे भी यही गुजारिश है कि आदर्श नागरिक होने का मतलब सरकार की अंधभक्ति करना नहीं होता। उसकी गलतियों पर टोकना, ( मोदीजी खुद को जन सेवक कहते हैं, मुझे विश्‍वास है कि वे भी अपनी सरकार की गलतियों को संज्ञान में लेंगे), सुधार करना आपकी और हमारी जिम्‍मेदारी है। यह स्‍वाभाविक है कि बहुमत से मिली जीत किसी को भी अहंकारी बना सकती है (अगर वे नहीं बने हैं तो देश के लिए अच्‍छा है), ऐसे में गलतियां भी होंगी। हम और आप मिलकर सुधारेंगे तो ही अच्‍छा है। अपने ईगो को साइड में रखिए और हर जगह सरकार की चाटुकारिता बंद करिए।

सादर,

आपकी तरह भारत की एक नागरिक

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