क्या प्रियंका में बाज़ी पलटने के माद्दा है?

April 30, 2014 11:22 am

आज राजनैतिक हलकों में यह सवाल गूँज रहा है कि क्या चुनाव प्रचार में पिछड़ चुकी कांग्रेस के द्वारा आखिरी दौर में खेला गया प्रियंका गांधी का दांव बाज़ी पलटने का माद्दा रखता है? क्या यह अनायास ही है कि प्रियंका गांधी, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को उनके ही स्टाइल में चुनौती दे रही हैं? या फिर यह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है?

Priyanka-Gandhiथोड़ी रिसर्च से ही पता चलता है कि कांग्रेस की ओर से इस चुनाव को लीड भले ही राहुल गांधी कर रहे हों, मगर मैनेज प्रियंका ही कर रही हैं। पार्टी पर करीब से नज़र रखने वाले सूत्र बताते हैं कि प्रियंका चुनाव से जुड़ी सभी तैयारियाँ खुद देख रही हैं। इसी क्रम में ज़मीनी सतह पर रणनीति बनाने के लिए प्रियंका ने पार्टी के सभी छोटे-बड़े प्रभावी नेताओं से कई राउंड मीटिंग की, यहाँ तक कि केन्द्रीय सलेक्शन कमेटी द्वारा तय किये जा चुके 100 से ज़्यादा उम्मीदवारों के नाम उनके द्वारा आखिरी समय में बदले गए।

हालाँकि प्रियंका को खुद भी यह अहसास रहा होगा कि उनके खुलकर सामने आने से रॉबर्ट वाढ्रा संपत्ति केस को लेकर विपक्ष, खासकर भाजपा उनपर आक्रमक हमलें कर सकती है। लेकिन यह भी सत्य है कि भाजपा के द्वारा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से चुनाव का रुख पूरी तरह से उनपर केन्द्रित हो गया है। इसके बाद जिस तरह से भाजपा और प्रतिक्रिया स्वरुप अन्य दलों ने पिछले चरण तक चुनाव प्रचार की जो रणनीति बनाई थी, उसमें भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दे पीछे छूट गए और साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों पर वोटो के ध्रुवीकरण की कोशिश की गई। इसी क्रम में दोनों ओर से वोट बैंक को साधने की कोशिश में पहले इमरान मसूद का छ: महीने पुराना बयान सामने लाया गया, और फिर अमित शाह, आज़म खान, वसुंधरा राजे, प्रवीण तोगड़िया और गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के बयान बीच-बीच में राजनैतिक बिसात बिछाते प्रतीत होते रहे।

ऐसे माहौल में जबकि 232 सीटों पर वोटिंग हो चुकी थी, प्रियंका को अवश्य ही यह अहसास रहा होगा कि उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप दूर की कौड़ी साबित नहीं होगा, जबकि उनका आक्रामक रुख बाकी बची सीटों पर गहरा प्रभाव छोड़ सकता है। इससे एक तरफ इन क्षेत्रों में मायूस कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की गई वहीँ भाजपा और उसके सहयोगी दलों की मोदी को केंद्र में रखकर चलने की रणनीति उल्टी पड़ती दिखाई दे रही है।

विश्लेषण करने पर पता चलता है के प्रियंका गांधी अप्रेल के मध्य से ही आक्रामक नज़र आ रही थी। सबसे पहले उन्होने वरुण गांधी पर हमला बोला और इन चुनावों को विचारधारा की लड़ाई बताया, जबकि उस समय केवल 111 सीटों पर ही वोटिंग हुई थी। हालाँकि इसके एक सप्ताह बाद ही उन्होने खुलकर भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों पर विचारधारा के नाम पर और खासतौर से नरेंद्र मोदी की “स्नूप गेट” जैसी कमज़ोरियों पर सीधा हमला किया। सनद रहे कि उस समय तक 232 सीटों पर वोटिंग हो चुकी थी। मगर तब तक उत्तर प्रदेशों में केवल 21 सीटों पर चुनाव हुए थे, जबकि 59 सीटों पर वोटिंग बाकि थी। इसी तरह बिहार में 13 सीटों पर चुनाव हुए थे और 27 सीटों पर वोटिंग होनी बाकि थी। इसके अलावा कांग्रेस की ज़मीन वाले पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की 96 सीटों पर वोटिंग होना शेष था, जहाँ उनके आक्रामक रुख से कांग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ताओं में जोश भर जा सकता था और भाजपा को चक्रव्ह्यू में घेरने की उनकी कोशिश का असर नज़र भी आया।

 

अमित शाह: जब एक न्यायिक आयोग (स्नूप गेट) मामले की जांच कर रहा रहा है तो इसकी नए सिरे से जांच की कोई आवश्यकता नहीं है, इस तरह इलज़ाम लगाने की जगह रिपोर्ट के लिए इंतजार करना चाहिए।

स्नूप गेट पर जवाब: जब एक न्यायिक आयोग (स्नूप गेट) मामले की जांच कर रहा रहा है तो इसकी नए सिरे से जांच की कोई आवश्यकता नहीं है, इस तरह इलज़ाम लगाने की जगह रिपोर्ट के लिए इंतजार करना चाहिए। – अमित शाह

राजनैतिक विश्लेषकों को प्रियंका का यह दांव बहुत ही सधा हुआ प्रतीत हो रहा है। एक तरफ उन्होंने अपने आप को केवल अमेठी और रायबरेली तक ही सीमित रखकर विरोधियों को ज़्यादा स्कॉप नहीं दिया है और दूसरी तरफ अचानक हमलावर होकर भाजपा और उसके सहयोगियों को भौचक्का कर दिया है।

एक कुशल राजनैतिक रणनीति की यह ख़ासियत होती है कि समय-समय पर विरोधियों को भौचक्का किया जाए,

जिससे उन्हें अचानक हुए घटनाक्रम से हैरत हो और वह गलतियाँ करें। नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम ने भी कई बार इस रणनीति को अपनाया है। हालाँकि राहुल गांधी इसमें फंसते हुए बहुत कम दिखाई दिए, लेकिन कांग्रेस के बाकी नेता अक्सर ही इस चक्रव्ह्यू में फंसते नज़र आए। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या ख़त्म होने के कगार पर बाकी बची जंग में प्रियंका गांधी, नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम को इस चक्रव्ह्यू में बाँध पाएंगी?

Strength:

प्रियंका गांधी की आक्रामक और धाराप्रवाह शैली, आमजन की भाषा पर पकड़, मुद्दों पर स्पष्ट सोच (clear concept ) और सहजता से अपनी बात रख पाने की क्षमता उन्हे जनता से जोड़ने में सहायक है। इसके अलावा युवाओं में उनका क्रेज़ राहुल गांधी के मुकाबले ज़्यादा है!

Weakness:

  • उनके पति राबर्ट वाढरा के उपर ज़मीन के सौदों और कम समय में 1 लाख से 350 करोड़ की आय जैसे गंभीर आरोप, उनके और कांग्रेस पार्टी के लिए परेशानियां पैदा कर सकते हैं.
  • प्रियंका का आगे आना अभी तक चुनाव की कमान संभाल रहे राहुल गांधी के लिए असहज हो सकता है.
  • सबसे अहम यह है कि यह दांव कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है, ऐसा होने पर स्थिति किसी भी तरफ पलट सकती है!
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